Posts

आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें..

आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें.. भागती ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुरा थोड़ा आराम कर लें.. कुछ तुम अपनी कहना, कुछ मेरी सुनना.. एक दुसरे का दर्द कुछ यूं बाँट लें.. सबने अपनी कही, किसी और की न सुनी.. आओ शब्दों की बानगी बुन लें.. साथ गुजारे कुछ लम्हों को याद कर लें.. क्या याद है तुम्हें ये दरख़्त, इसकी छाँव? बैठ कर भरी दोपहर में, इसी के नीचे.. भविष्य को संवारा करते थे.. आज भी उन हंसीं पलों को याद कर, खुश हो लेता हूँ.. चलो फिर से दोहराते हैं, उन घड़ियों को..      आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें.. भागती ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुरा थोड़ा आराम कर लें..

बड़ो ने कहा है - मेरा भी घर होगा !

Image
बड़ो ने कहा है मेरा भी घर होगा, अपने सर पे भी एक छोटा-सा छत होगा. छोटी-सी उम्र से ईट-पत्थरो को जोड़ा है मैंने, माँ-बाबा के साथ चिलचिलाती दोपहर में, छोटे भाई को ले मिटटी-गारे को ढ़ोया है मैंने. आज बाबा की नसों में जान कुछ कम सी हो गयी है. माँ भी कुछ झुंक-सी गयी है, उम्र ता उम्र बढ़ बीमारी भी गयी है. आँधियों ने चिरागों को बुझाया है, इसलिए मैंने सितारों को अपने आँगन में सजाया है. आज उम्र की इस मुकाम पर, मैं अकेला खड़ा हूँ. सबका साथ छुट गया, शहर में वीरान पड़ा हूँ. बचपन में शहर को फैलता देखा था, आज न जाने क्यों इसको सिकुड़ता पाया हूँ. क्या इन ईट-पत्थरों के शहर में अपने सपनो को पूरा कर पाउँगा? बड़ो ने कहा है की मेरा भी घर होगा, अपने सर पे भी एक छोटा- सा छत्त होगा.

गर कभी अकेला महसुस करो

गर कभी अकेला महसुस करो आ जाना बेहिचक   आज भी बैठा हूँ तेरे इन्तजार में   संग बैठ पियेंगे चाय   वही टूटी लकड़ी के तख़्त पर जहाँ कभी बैठ घंटो बिताते थे   भविष्य की किताबो की पन्नो का पलटना   गुदगुदाती थी हसीं लम्हे गर कभी अकेला महसुस करो आ जाना बेहिचक   आज भी बैठा हूँ तेरे इन्तजार में   बहुत कुछ बदला है समय के सयाही ने   कभी ज़मीं को आसमां तो   कभी आसमां को ज़मीं पे उतरते देखा है दिल ने भी पत्थर सा एहसास किया है   क्योंकि कभी चूड़ियों को हाथो में खनकता   तो कभी टूटता पाया है   गर कभी अकेला महसुस करो आ जाना बेहिचक   आज भी बैठा हूँ तेरे इन्तजार में  

मैं बालक हूँ छोटा, कभी खेला, कभी मिटटी में लेटा

मैं बालक हूँ छोटा , कभी खेला , कभी मिटटी में लेटा. तुम मुझेसे लिखने को कहते हो ? जब मैंने लिखा तो पढने को कहते हो. जब पढ़ा तो समझने को कहते हो. और जब समझा तो समझाने को कहते हो. उफ्फ.. थक गया बड़ो की दरिंदगी से. बचपन से ही बड़ो की सीख देने लगे.. बड़े तो तुम खुद न हो सके.. आज भी छिपा है तुम्हारे अन्दर वो बचपना. मैं बालक हूँ छोटा , कभी खेला , कभी मिटटी में लेटा! 

बाँध के पगड़ी सूरज ने

बाँध के पगड़ी सूरज ने कैसी शिद्दत है दिखलाई , इस तपती धुप में देखो ,  है   सबकी शामत आई . अन्दर गर्मी लगती है और बाहर भी है धुप कड़ी , आग बरसती है अम्बर से , धरती सारी जली पड़ी . पंछी सारे चोच खोलकर , छिपते फिरते इधर   उधर , राही भी थक   हार के , देखो ताने बैठे हैं चादर . खेलते बच्चे , सो गए अब तो थक हार कर , चौराहे का काला कुत्ता , हांफ रहा जीभ निकाल कर . खपरैल के नीचे बैठा श्रमिक झेल रहा पत्ते का पंखा , एक हाथ पानी बोतल , और दूजे में सत्तू - चोखा . आराम से लेटा धरती बिस्तर और पत्थर को कर तकिया , गर्म हवाओ ने हाय सबको आखिर ढेर किया . भरी दोपहरी अम्मा ने आचार आम का लगवाया , भाभी ने भी मेहमानों को सौफ का शरबत   पिलवाया . खड़ा चौक पर बिरजू भी देखो गुर मंतर सिखलाता , पांच रुपये का आम पन्ना बेच , गर्मी का मुंह चिढाता .

तुम्हारे ही गुण से ...

तुम्हारे ही गुण से ... तुम्हारे ही दोष से ... सिखा   है मैंने बहुत कुछ। तुम संग , जिंदगी की अंगड़ाइयों में ... धुप और छाव में ... सिखा   है मैंने बहुत कुछ। कमज़ोर कड़ियों   में ... हमारे मजबूत बन्धनों में .. सिखा   है मैंने बहुत कुछ। कभी रोते हुए पलों में ... संग गुनगुनाते हुए छणो में ... सिखा   है मैंने बहुत कुछ। ऐसे ही कट जाये खूबसूरती से लम्हे ... गर साथ हो , हर दम तुम्हारा ... यही ' आसरा ' हो हमारा-तुम्हारा।

जीवन-साथी की दूकान

      चौकिये मत! यह कोई व्यस्को की समस्याओं की समाधान या इलाज़ करने वाली क्लिनिक या दुकान का नाम नहीं है.             मैं भी जब यह पहली बार उस रिक्शेवाले भैया से इसके बारे में सुना था तो चौक गया था. दरअसल बात यह है की कल शाम जब मैं ऑफिस से घर लौट रहा था तो मौसम का रूख बहुत सुहाना हो रखा था यानि की बारिश जम कर हो रही थी. मैं जैसे ही सेक्टर-१४ , द्वारका मेट्रो स्टेशन , से बाहर निक ला , बारिश अपने चरम सीमा पर थी. घर पहुँचते-पहुँचते शायद मैं भींग जाता इसलिए मैंने रिक्शा लेना ठीक समझा. रिक्शेवाले ने हमारे अपार्टमेन्ट का किराये बताये बगैर ही मुझे बैठा लिया. जैसे ही हम थोड़ी दूर पहुंचे , मैंने उससे पूछा कि ' इरोस मेट्रो मॉल ' में ये कौन-सी दुकान खुल गयी है ? उसने बड़े ही सरलता से जवाब दिया "सर ये जीवन-साथी की दुकान है". इससे पहले की मैं कुछ समझता या पूछता , उसने फिर कहा "इसके साथ का जोगाड़ - एम् डी भी खुल रहा है".         रिक्शेवाले भैया कि दोनों बातों को समझने में मैं असमर्थ था , इसलिए उत्सुकतापूर...