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The Great Exam Circus: A Desi Edition by Kumar Rajnish

 *The Great Exam Circus: A Desi Edition by Kumar Rajnish*  As this Sunday morning sun painted the sky in hues of orange and pink, a bustling scene unfolded in a quaint Indian town, setting the stage for the greatest show on earth - competitive exam day. Parents, armed with to-do lists longer than a Bollywood blockbuster, herded their young scholars with a mix of determination and trepidation. "Don't forget your admit card, ID, water bottle, pencil and pen, and a quick prayer to the exam gods!" they exclaimed, their voices a symphony of parental concern and hope.God bless my Baccha!  At the exam center, the air crackled with nervous energy as parents bid farewell to their offspring, sending them off into the academic arena like gladiators to battle. Left to fend for themselves in the wilds of waiting, parents found solace in the makeshift marketplace that sprang up outside the exam premises. It's all Business - this is the underline and understatement, I am reading. Am...

एक दूसरे के अनुपूरक होकर भी - कुमार रजनीश

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मैं और तुम एक - एक कोना पकड़े बैठे हैं अपने मोबाइल के दुनिया में गुम। रिश्तों के नाम पर ये झल्ली-सी, इंटरनेट की रिश्तेदारियों में व्यस्त, किसको ढूंढ रहे, कुछ पता नहीं। मैं भी समेटे अपने आप को और तुम भी अपने दोनों पैरों को मोड़ें हुए कुछ मंद मंद मुस्कान लिए, न दिखाई पड़ती हुई रिश्तों को, सुई धागों की तरह सिल रहें, रफ्फू करते हुए, फटे चादर की तरह। ये बीच बीच में घूंट-घूंट पानी पीने की आवाज़ हम दो शरीर को जीवित होने का एहसास करा रहा था। शून्य की सीमा से परे शायद कुछ ढूंढने की ही बरबस कोशिश थी। कुछ तलब थी, न मिल पाने वाले की चाह की। गौरतलब हो कि दो दिलों की धड़कन, अभी भी हमारे होने का एहसास करा रही थी। उसका और मेरा। कभी एक पल दीवारों को टक टकी लगाना फिर कुछ अपने अंदर समाए, भाव भंगिमाओं को,  समेटते हुए, फिर अपने बनाए दुनिया में कुछ ऐसे गुम हो गए जैसे दो अजनबी बैठे हो आस - पास न जानने के लिए,  न कुछ समझने के लिए। कभी अनुभव किया है ? जब दो लोग एक दूसरे के अनुपूरक होकर भी, अनजान से दो अलग रास्तों को जन्म देते हैं? उसकी दशा और दिशा देखने के लिए ...

सहभागिनी भी और संगिनी भी।

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वह सहभागिनी भी है और संगिनी भी।  उसके हाथ ईट के चूल्हे भी बनाते हैं और पति के साथ दिहाड़ी पर ईट भी ढोते हैं। इस कोहरे - से ढके सुबह में अपने बच्चे और पति को चूल्हे पर पकी, गर्मागर्म रोटी खिला रही है और साथ ही अपने लिए टिफिन का बंदोबस्त भी कर रही है। खुद पतली-सी शॉल ओढ़े, अपने पति और बच्चे को सिर से पैर तक मोटे उनी कपड़े से ढक रखी है। उसने अपने थाली में लाल मिर्च-नमक और रोटी, नाश्ते के लिए रखा है और पति और बच्चे के लिए थाली में, तरकारी, अचार और रोटी सजा रखी है। इन सबके बीच, उसके चेहरे पर तेज़ है, खुशी है और एक प्रकार की संतुष्टि है। यह चमक और तेज शायद इसलिए क्योंकि वो अपनी जिम्मेदारियों को बहुत अच्छे से निभा पा रही है। अरे ये क्या? दूर से ये कैसी आवाज आ रही है? कुछ सभ्रांत परिवार के महिलाओं की आवाज - नारी सशक्तिकरण के लिए महिलाएं जागे! अपना हक मांगे, इस समाज से। जागो बहन जागो! इन सभी को आकर इस 'एंपावर्ड' महिला से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है या इसे भी अपने साथ बर्गलाने की जरूरत है? ये हम सबके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। पर एक बात तो है कि जब तराजू पर महिला ...
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जब भी सुबह खिड़की खोलो, तो सुबह वाली खुशियों को अन्‍दर आने देना। देखना कि उसी के साथ, छोटे बच्‍चों की किलकारियाँ भी साथ आएं, जो नई ऊर्जा के साथ, चहकते हुए अपने नन्‍हें कदमों से स्‍कूल जा रहें हों। जब भी सुबह खिड़की खोलो, तो ध्‍यान से सुनना कि कोयल की आवाज, जो तुम्‍हारे कान में मिश्री घोल रही हो। बड़े चाव से अपनी पंखुड़ियों को फैलाए, उस मुनिया को देखना जो फूलों पर मंडराती हो। जब भी सुबह खिड़की खोलो, तो अपने चेहरे को दोनों हाथों से थामे चौखट पर खडे हो, ठंडी, उन्‍मुक्‍त हवाओं को अपने अन्‍दर भरने देना, कि करना, एक नया अहसास, अपने खुलेपन का। जब भी सुबह खिड़की खोलो, तो पीपल के पत्‍तों से उन ओस की बूंदों को, मोतियों के समान अपनी हथेलियों पर चुनना। हो सके तो अनुभव करना, एक अनुपम अनुभूति का, और समेट लेना उसे अपने मन और मस्तिष्‍क में। जब भी सुबह खिड़की खोलो, तो सूरज की किरणों को आने देना, अपने झरोखों से, जो नई ऊर्जा का विस्‍तार करेगी, तुम्‍हारे जीवन में, सुनहरे भविष्‍य की तरह। हो सके तो उसके हल्‍के स्‍पर्श के ताप को अपने अन्‍दर समाहित करना, और तरो-ताज़ा करना अपने अंतर्...

Journey to Kashmir – A short trip with beautiful memories.

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Intensifying the beauty of Himalayas in the northernmost part of India, Kashmir valley is an apt place to witness nature in its own form. Surrounded by the snow-capped mountains, the implausible beauty of Kashmir leaves an everlasting impression on one’s mind. There are a number of reasons to satisfy the above heading; ranging from the waterfront gardens, the Chinar trees, awe-inspiring lakes and the sumptuous weather. The people over here are very polite and are known for their hospitality. It is said that the people of Kashmir welcome everyone with a sense of unity and immense brotherhood. People in Kashmir are a little bit introverted but the hospitality one will receive here is awe inspiring. Such people can only be found in ‘Heaven’, like Kashmir.           The unparalleled alpine beauty of the mountain ranges and the waterfalls flowing along are undoubtedly a breathtaking experience. Owing to its scenic beauty and naturally created sites, Kashmir is ...

रावण के दर्द को महसूस किया है.....

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मैंने महसूस किया है उस जलते हुए रावण का दुःख जो सामने खड़ी भीड़ से बारबार पूछ रहा था..... " तुम में से कोई राम है क्या ?" मैंने महसूस किया है उस जलते हुए रावण का दुःख जब भीड़ से कुछ भी जवाब न मिला तो रावण फिर एक बार उदास हो अपने आँशुओं को पोछते हुए सिर्फ यहीं बुदबुदा पाया की काश! राम होते तो रावण का क़द्र करना जानते यहाँ तो सभी अपने अंदर के रावण को मार नहीं सकते इसलिए मेरा पुतला बना , अपने अहंकार को जगा , अंदर के आग को और भड़का मुझे जलाने में लगे हैं मैंने महसूस किया है उस जलते हुए रावण का दुःख जब मंच के पीछे बैठा एक गरीब रावण के आवाज़ में दहाड़ता है तो उसे अपने भूख मिटने का एहसास होता है जब-जब रावण जलेगा तब-तब उसकी जीविका चलेगी रावण तो हर बार जलना चाहिए , परन्तु किसी राम के हाथ , न की ' राम ' रुपी रावण के हाथ मैंने महसूस किया है उस जलते हुए रावण का दुःख ( ऊपर के पांच पंक्ति किसी और से लिया गया गया है)

मातृत्व: Motherhood

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The moment a child is born, the mother is also born. She never existed before. The woman existed, but the mother, never. A mother is something absolutely new.

एक एक टुकड़ा जोड़कर……

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एक एक टुकड़ा जोड़कर कुछ बनाया था नहीं था आसां कठिन फिर भी न होने दिया सपने बुनकर संजोया था बड़े प्यार से जिसे मान लिया हमने अपना 'जहां' हर पल जीवन जीने के लिए क्या पता था टुकड़े-टुकड़े में बिख़र जायेगा ये अपना 'जहां' युहीं छुट जाएगा क्यों कोई सुन्दर सपना भरमा गया मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह छुटता चला गया न जाने किस 'जहां' में - कुमार रजनीश

तिरंगे के रंगो में देखा है -एक सपना

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तिरंगे के रंगो में देखा है -एक सपना आने वाला कल होगा, निर्भिक सब कुछ होगा अपना कच्ची धुप में खिलेंगे, खेलेंगे और खिलखिलायेंगे जिन खुशियों के लिए तरसती थी आँखें सब मिल-जुल बढ़ेंगे ऐसा कल हो अपना धर्म-जाति का नाम न लेंगे छोटे-बड़े में द्वेष न होंगे ऐसा देश हो अपना नेता-नीति की बात न होंगी मानव सेवा ही धर्म हो अपना बड़े-बूढ़े मार्गदर्शक हो अपने हँसता हो बचपन अपना पैसे के मोल न होंगे स्नेह-भाव हो पथिक अपना 'आसरा' की सोच है ऐसी सुन्दर सजता सपना तिरंगे के रंगो में देखा है -एक सपना

हिन्दुस्तान की बेटियाँ

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आज सुबह के अनुभव को आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ. दिल्ली मेट्रो ट्रेन में सुबह एक छोटे सुखद परिवार से आखें चार हुई. मन ही मन में बहुत सारी बातें भी हुई. इस परिवार के सदस्य थे - दो बेटियाँ और एक माँ ! एक छोटी बेटी जो अपने माँ के गोद में साड़ी के आंचल से ढंकी हुई थी और दूसरी बेटी कुछ ६-७ वर्ष की, एक ढोलक और एक लोहे के छल्ले के साथ खड़ी थी. उस बच्ची के आँख में इतनी चमक थी, जोश था, गजब का आत्मविश्वास था की बता नहीं सकता। चूँकि हम सभी खड़े थे और मेट्रो की रफ़्तार कुछ ज्यादा थी जिससे वह छोटी बच्ची कभी अपने माँ को डगमगाने से बचाती थी तो कभी अपनी रोती हुई छोटी बहन को चुप कराने में व्यस्त थी. वह अपने कुर्ता की जेब से ग्लूकोस बिस्कुट निकाल कर अपनी माँ को भी खिला रही थी और साथ में अपनी छोटी बहन को भी. नियति के इस रीत को देख कर मैं गद-गद हो रहा था. वाह रे हिन्दुस्तान की बेटियाँ तुम पर नाज़ है. जीवन ज्ञापन करने की कला सीखने के लिए हमें स्कूल, कॉलेज और बड़े बड़े यूनिवर्सिटी जाने की जरुरत नहीं, हमारा तो ज्ञानशाला हमारे बीच में ही उपलब्ध है सिर्फ आँखें खुली रखने की जरुरत है. जी हाँ, यह परिवार नित्य दि...

नए साल के ग्रीटिंग्स कार्ड्स

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वह छूकर देखने और महसूस करने का आलम भी बड़ा रोचक होता था. जी हाँ, गुलाब और कई तरह के फूलों वालो से सुसज्जित नए साल के ग्रीटिंग्स कार्ड्स की बात कर रहा हूँ. हम लोगों का नव वर्ष मनाने का तरीका शायद सब का एक जैसा ही था. दिसंबर महीने के आखिरी दो हफ्तों में तरह तरह के रंग बिरंगे सीन-सीनेरियों वाले, दिल वाले, कबूतर और शांति के प्रतीक वाले, कुछ हाथ से बने सीसन्स कार्ड्स को खरीदने और डाक द्वारा भेजने में व्यस्त रहते थे. बड़े ही प्यार और स्नेह से रंग बिरंगी स्केच पेंस से कार्ड्स में सन् देश लिखा जाता था. बहुत लोग अपनी रचित कविता, गीत या शायरी भी लिख डालते थे. लिफ़ाफ़ा को कैमल ब्रांड के गोंद से चिपका या फिर पोस्ट ऑफिस के हलके नीले या हरे रंग के लई से चिपका, उसके ऊपर डाक टिकत को जीभ से गीला कर दे फटा-फट.… अब अंतिम काम सब लिफ़ाफ़े को अलग अलग पोस्ट बॉक्स में डाल नए साल की शुरुआत होती थी. पुरे साल में सबसे ज्यादा अगर कोई प्रिय लगता था तो वो थे डाकिया बाबु। अपनी साईकल की घंटी बजाई नहीं की सब के सब दरवाजे के बाहर। अरे ये ग्रीटिंग कार्ड मेरे होगा, अरे नहीं हटो ये मेरा है.… बस सब के मन में ख़ुशी की लहर. कुछ...

ज़िन्दगी और मूँगफ़ली

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हमारी ज़िन्दगी और मूँगफ़ली में बहुत समानता है. मूँगफ़लीवाला अपने मूँगफ़ली को खूब अच्छी तरह से भुनता है. मूँगफ़ली करारी हो और सारे दाने अच्छे से भुन जाए इसके लिए अपना पूर्ण प्रयास करता है. अब, जब आप मूँगफ़ली को तोड़कर खाते हैं तो उसमे से ज्यादातर द ाने अच्छे और करारे होते हैं परन्तु कुछ-एक दाने कच्चे या फिर ज्यादा जले होते हैं. जबकि मूँगफ़ली बेचने वाला अपने समर्पित भाव से कर्म करता है. हमारा जीवन भी ठीक उसी प्रकार से है. हम अपने बच्चो को सही दिशा और दशा निर्देशित करते हैं. अपने कर्म को प्रधान बनाते हुए सकारात्मक शैली से उनके नियति का लेख लिखने की कोशिश करते हैं. फलस्वरूप हमारे बच्चे समाज के सच्चे मार्गदर्शक बनते हैं. परन्तु कुछ-एक कर्म और दायित्व के सन्मार्ग से विचलित हो असामाजिक तत्त्व के अधीन हो जाते हैं. जबकि आपने अपना सम्पूर्ण दिया है. जीवन जीने की कला सीखना बहुत जरूरी है और यह सिर्फ धन से प्राप्त नहीं हो सकता, यह मेरा मानना है. अतः फुर्सत के चंद लम्हे निकाल कर नमक और मिर्ची के साथ मूँगफ़ली खायें और जीवन का आनंद उठायें।

सैलाँ बनाम सैलून

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जी हाँ, आज कल हमारे यहाँ दो तरह का हेयर कटिंग सैलून पाया जाता है। सबसे पहले आपको सैलाँ से रू-ब-रू करवाते हैं। जाहिर है, जो महानगर में रहते हैं, उन्‍हें ज्‍यादातर इसी ‘यूनीसेक्‍स सैलाँ’ से पाला पड़ता होगा। वेल डि‍सिप्लिन्‍ड वाले सैलाँ में घुसते ही आपका स्‍वागत एक मुस्‍कुराती हुई सुन्‍दर कन्‍या द्वारा किया जाता है। अपनी प्‍लास्टिक स्‍माईल को बरकरार रखते हुए, आपसे बहुत सारे मल्‍टीपल च्‍वाईस प्रश्‍न पूछती है – जैसे कौन-सा हेयर स्‍टाईल रखेंगे – स्‍पाईक, स्‍ट्रेट, आर्मी कट – और उसके बाद हॉलीवुड और बॉलीवुड हीरो-हिरोइन के स्‍टाईल भी। अभी आप इस मंझधार से उबरे भी नहीं कि शेव कौन-सा कराएंगे वगैरह-वगैरह। थैंक गॉड, ये सारे ऑप्‍शन्‍स के लिए आप जवाब दे पाते हैं कि क्‍योंकि आपकी जेब के वॉलेट मोटी और गरम है। क...

वह तो खड़ा था अपनी मिटटी पर

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वह तो खड़ा था अपनी मिटटी पर  परछाई ही उसकी पार कर गयी वो सीमा  बहुत जख्म झेले उसने  मिटा दिया अस्तित्व, छीन ली उसकी साँसे  वह तो समझता था एक ही धरा  उसे क्या पता था कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए  बाँट दिया इस धरा को  कुछ अपने लिए, कुछ उनके लिए  वह तब भी समझा था एक ही धरा  अब भी समझता है एक ही मिट्टी  वह जी कर तो न बतला पाया  हाँ, मगर मर कर बतला गया  अपनी धरा को, उनकी धरा को  सब एक धरा के लाल हैं  सबने इसमें मिलना है मत बाटों अपनी माँ को  तुम भी सोना, हम भी सोयें  इस माँ के आँचल में  - कुमार रजनीश

रेवांत की गिनती शुरू

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तारों में सजके .. अपने प्रितम से देखो धरती चली मिलने ...

एक धुन छेड़ता हूँ मैं .. कुछ सुनने और सुनाने के लिये ..

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सूफी संगीत में डूबने की एक कोशिश

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आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें..

आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें.. भागती ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुरा थोड़ा आराम कर लें.. कुछ तुम अपनी कहना, कुछ मेरी सुनना.. एक दुसरे का दर्द कुछ यूं बाँट लें.. सबने अपनी कही, किसी और की न सुनी.. आओ शब्दों की बानगी बुन लें.. साथ गुजारे कुछ लम्हों को याद कर लें.. क्या याद है तुम्हें ये दरख़्त, इसकी छाँव? बैठ कर भरी दोपहर में, इसी के नीचे.. भविष्य को संवारा करते थे.. आज भी उन हंसीं पलों को याद कर, खुश हो लेता हूँ.. चलो फिर से दोहराते हैं, उन घड़ियों को..      आओ बैठ कर दो-चार बातें कर लें.. भागती ज़िन्दगी से कुछ पलों को चुरा थोड़ा आराम कर लें..

बड़ो ने कहा है - मेरा भी घर होगा !

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बड़ो ने कहा है मेरा भी घर होगा, अपने सर पे भी एक छोटा-सा छत होगा. छोटी-सी उम्र से ईट-पत्थरो को जोड़ा है मैंने, माँ-बाबा के साथ चिलचिलाती दोपहर में, छोटे भाई को ले मिटटी-गारे को ढ़ोया है मैंने. आज बाबा की नसों में जान कुछ कम सी हो गयी है. माँ भी कुछ झुंक-सी गयी है, उम्र ता उम्र बढ़ बीमारी भी गयी है. आँधियों ने चिरागों को बुझाया है, इसलिए मैंने सितारों को अपने आँगन में सजाया है. आज उम्र की इस मुकाम पर, मैं अकेला खड़ा हूँ. सबका साथ छुट गया, शहर में वीरान पड़ा हूँ. बचपन में शहर को फैलता देखा था, आज न जाने क्यों इसको सिकुड़ता पाया हूँ. क्या इन ईट-पत्थरों के शहर में अपने सपनो को पूरा कर पाउँगा? बड़ो ने कहा है की मेरा भी घर होगा, अपने सर पे भी एक छोटा- सा छत्त होगा.